ऐ काश......

ऐ काश मेरे हिस्से में, 
कोई "काश" न होता!
गुलज़ार होती जिंदगी.. 
दिल बेजार न होता !!
गुजरती उम्र के संग, 
यह काश बड़ा तड़पता है
बहुत सा "काश"
दिल में "दफन" ही हो जाता है!
समेट लेती मैं,,,
इस दामन में अपने हिस्से का सुख
गर पहना मैंने 
संस्कारों का लिबास न होता !!
ऐ काश ...












वो कौनसा जानवर है जिसका आधार कार्ड बनाया जा सकता है ?


हमारा भारत देश हो या कोई और देश हर कहीं नागरिकों की पहचान के लिए पहचान पत्र अनिवार्य होता है। वहीं हमारे देश में भी इसके लिए पूर्व सरकार द्वारा नया तरीका निकाला गया है जो आधार कार्ड के रूप में बनाया जाता है, लेकिन इसमें हैरानी की बात यह है कि हमारे देश में अभी तक केवल इंसानों का ही आधार कार्ड बनाया जाता है। अब जो बात हम आपके साथ साझा करने जा रहे हैं वो काफी अटपटी से लग सकती है।
दरअसल, ये बात तो आप मानते हैं न कि जानवरों के फिंगरप्रिंट हम इंसानों के जैसे नहीं होते हैं। इसलिए उनके आधार कार्ड नहीं बनाए जा सकते हैं, तो जान लिजिए कि ऐसा नहीं है दुनिया में एक ऐसा भी जानवर है जिसके फिंगरप्रिंट हम इंसानो के जैसे हैं और उसका आधार कार्ड बनाया जा सकता है। जी हां, इस जानवर का नाम है कोआला (Koala) और यह ऑस्ट्रलिया में पाया जाता है। इस तरह प्रश्न General Knowledge Gk in Hindi के अंतर्गत पूछे जाते है |

कोआला (Koala) का आसानी से बनाया जा सकता है आधार कार्ड
इस जानवर की हाथों की उंगलियां हम इंसानों की उंगलियों जैसी ही होती हैं। इतना ही नहीं कोआला के हाथों की उंगलियों के फिंगर प्रिंट भी लिए जा सकते हैं। ऑस्ट्रेलिया में पाए जाने वाले इस कोआला के फिंगरप्रिंट इंसानों के फिंगरप्रिंट मिलते जुलते हैं। इसलिए ऐसा माना जाता है कि अगर कोआला के फिंगरप्रिंट लेकर इसका आधार कार्ड बनाया जाए तो जरूर बन सकता है। आधार कार्ड बनाने के लिए फिंगरप्रिंट बहुत आवश्यक है तो कोआला के पास वो हैं।

ऑस्ट्रेलिया के दक्षिण और पूर्वी तटों पर पाया जाता है कोआला
बता दें कि कोआला नाम का यह जानवर ऑस्ट्रेलिया में पेड़ों पर रहता है। कोआला एक शाकाहारी जानवर है और यह ज्यादातर ऑस्ट्रेलिया के दक्षिण और पूर्वी तटों पर मिलता है। फेसकोलर्कटीडाये प्रजाति के जीव वैज्ञानिक कुल के एकमात्र सदस्य के रूप में जाना जाता है। 20वीं सदी के आस पास बड़ी संख्या में इस कोआला नाम के जानवर को ऑस्ट्रेलिया में मार दिया गया था, फिर इन्हें विक्टोरिया से लाकर संरक्षित किया गया। यह कोआला जानवर उन क्षेत्रों में पाया जाता है जो ज्यादा शुष्क नहीं हो और अंदरूनी विस्तृत हो।

बैंक में नौकरी नहीं लगी तो खुद का ही फर्जी 'स्टेट बैंक ऑफ इंडिया' खोल लिया


कुडलोर जिले के पनरुति में कमल बाबू नाम के एक 19 साल के लड़के पर एसबीआई की फर्जी शाखा खोलने का आरोप है। पुलिस ने बताया कि कमल के माता-पिता एसबीआई के कर्मचारी थे। पिता का 10 साल पहले निधन हो गया था। जबकि मां दो साल पहले एसबीआई से रिटायर हुई थीं। कमल कोई काम नहीं करता था। उसने पिता की जगह नौकरी के लिए बैंक में फॉर्म दिया था। लेकिन उसे नौकरी नहीं मिली। ऐसे में उसने खुद का ही बैंक खोलने का फैसला किया। वह बचपन से ही अपने माता-पिता के साथ बैंक जाया करता था। इस तरह से बैंक के बारे में काफी नॉलेज थी।

एक कस्टमर ने पुरानी ब्रांच में बताया तो खुला राज़
पुलिस के अनुसार, कमल ने तीन महीने पहले पनरुति बाजार नाम से एसबीआई की शाखा खोली थी। एसबीआई के एक कस्टमर ने नई शाखा देखी तो उसने पुरानी ब्रांच में इस बारे में बात की। उस बैंक के ब्रांच मैनेजर ने अपने जोनल हेड से नई ब्रांच खुलने के बारे में पता किया। जोनल हेड ने बताया कि पनरुति में तो एसबीआई की कोई नई ब्रांच नहीं खुल रही।
मैनेजर की शिकायत के बाद एसबीआई के अधिकारी नई ब्रांच के दफ्तर में गए। वहां दफ्तर को देखकर हैरान रह गए। क्योंकि वहां सब कुछ ऑरिजनल बैंक जैसा ही था। यह सब देखकर पुलिस में शिकायत की गई।

फर्जी ब्रांच में सब कुछ असली बैंक सा
पुलिस कार्रवाई में कमल बाबू, उसके साथी 52 साल के मणिकम और 42 साल के कुमार को गिरफ्तार किया गया। पूछताछ में पता चला कि कमल ने बैंक खोलने की योजना बनाई। मणिकम ने बैंक स्टांप वगैरह तैयार की जबकि कुमार ने बैंक की स्टेशनरी, पासबुक, चालान तैयार किया। फर्जी शाखा के लिए कमल ने कंप्यूटर, लॉकर और बाकी सैटअप खरीदा था। साथ ही पनरुतू बाजार ब्रांच नाम से वेबसाइट भी बनाई गई।

आरोपी बोला- चूना लगाना नहीं, बैंक खोलना था मकसद
पुलिस की अभी तक की जांच में सामने आया है कि इस फर्जी ब्रांच से अभी तक पैसा का कोई लेनदेन नहीं हुआ था। ऐसे में किसी के भी पैसे नहीं डूबे। पुलिस ने कहा कि आरोपियों ने लॉकडाउन के दौरान ब्रांच खोली। उन्हें लगा कि इस दौरान किसी को पता नहीं चलेगा। पूछताछ में कमल बाबू ने बताया कि उसका मकसद लोगों को चूना लगाना नहीं था। वह तो खुद का बैंक खोलना चाहता था। इसलिए उसने यह कदम उठाया।

Tiktok सरकार ने बैन कर दिया, पर इससे लोगों की कमाई कैसे होती थी?



सोमवार, 29 जून को केंद्र सरकार ने 59 मोबाइल ऐप को बैन करने की घोषणा की। इनमें टिकटॉक भी शामिल है। वीडियो प्लेटफॉर्म के तौर पर इस्तेमाल होने वाले इस ऐप के भारत में ही लगभग 20 करोड़ यूजर हैं। टिकटॉक पर कई ऐसे लोगों के अकाउंट हैं, जिन्हें लाखों की संख्या में लोग फॉलो करते हैं। टिकटॉक इंडिया के हेड निखिल गांधी ने कहा था कि टिकटॉक 14 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है। ये लाखों लोगों की आजीविका का साधन है। सवाल है कि आखिर लोगों को टिकटॉक से कमाई कैसे होती है? वीडियो बनाने वाले को किस हिसाब से पैसा मिलता था? टिकटॉक लाखों लोगों की आजीविका का साधन कैसे बन गया था?

2016 में आया और छा गया
टिकटॉक 2016 में लॉन्च हुआ था। अप्रैल 2020 तक गूगल प्ले स्टोर और Apple App Store से टिकटॉक डाउनलोड की संख्या दो बिलियन यानी दो अरब तक पहुंच गई। इसमें भारत में 611 मिलियन डाउनलोड हुए. लगभग 30.3 प्रतिशत। मोबाइल इंटेलिजेंस फर्म सेंसर टावर के अनुसार, भारत ने टिकटॉक डाउनलोड के मामले में चीन को पीछे छोड़ दिया। चीन का ये ऐप वहां 196.6 मिलियन डाउनलोड हुए. कुल हिस्सेदारी 10 प्रतिशत से भी कम।
इस आंकड़े से आप अंदाजा लगा सकते हैं कि टिकटॉक भारत के लिए कितना बड़ा मार्केट है। पिछले साल टिकटॉक की पैरेंट कंपनी बाइटडांस ने कहा था कि वह भारत में लगभग एक बिलियन डॉलर, यानी लगभग 70 अरब रुपए निवेश करने जा रही हैं। कंपनी ने 1000 लोगों को नियुक्त करने की बात कही थी. तब तक कंपनी भारत में 100 मिलियन डॉलर का निवेश कर चुकी थी। एक रिपोर्ट के मुताबिक, टिकटॉक के मालिकाना हक वाली कंपनी बाइटडांस ने पिछले साल तीन अरब डॉलर यानी 22,500 करोड़ रुपये का मुनाफा कमाया। हालांकि यह कमाई सिर्फ टिकटॉक की नहीं, बल्कि हेलो समेत अन्य प्रोडक्ट की भी है। 2019 में सिर्फ टिकटॉक से कंपनी को करीब 720 करोड़ रुपए की कमाई हुई थी।

टिकटॉक पर कमाई कैसे होती है?
ये तो टिकटॉक की कमाई की बातें थीं। लेकिन टिकटॉकर्स कैसे पैसे कामते हैं? अगर आप ये पूछेंगे कि टिकटॉक पर एक व्यक्ति कितना कमा लेता है, इसका सीधा जवाब देना मुश्किल है। यूट्यूब की तरह टिकटॉक के पास क्रिएटर्स के साथ रेवन्यू शेयरिंग का कोई मॉडल नहीं है। टिकटॉकर्स अपने अकाउंट से ब्रांड का प्रमोशन करके पैसा कमाते हैं।
इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग कंपनी Sociopool के फाउंडर आशीष भारद्वाज 200 से ज्यादा यूट्यूबर्स के साथ ही टिकटॉक जैसी कई कंपनियों के लिए काम करते हैं। उनका कहना है कि टिकटॉक पर पैसा कमाने के लिए कम से कम एक मिलियन यानी लगभग 10 लाख फॉलोअर्स होने चाहिए। 50 हजार, एक लाख फॉलोवर्स से कुछ नहीं होता है। जिनके मिलियन में फॉलोअर हैं, वो ही पैसा कमा पाते हैं। यानी टिकटॉक पर वीडियो बनाने वाले हर बंदा पैसा नहीं कमा रहा है।

फॉलोअर्स मतलब पैसा?
आशीष का कहना है कि टिकटॉक भी अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की तरह ही है‌। अगर आप टिकटॉक पर पापुलर होते हैं, तो ब्रांड आपको नोटिस करना शुरू कर देते हैं। आपसे संपर्क करते हैं और प्रमोशन के लिए पूछते हैं। इसके बदले आपको पैसे मिलते हैं। एक इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग कंपनी टिकटॉक पर उन लोगों से संपर्क करती है, जिनमें इस बात की संभावना दिखती है कि आने वाले समय में उनके फॉलोअर्स की संख्या बढ़ सकती है। क्योंकि फॉलोअर्स बढ़ने का मतलब है कि आपकी वैल्यू बढ़ेगी। एक बार जब फॉलोअर्स की संख्या बढ़ जाती है, तो ब्रांड्स विज्ञापन के लिए संपर्क कर सकते हैं। ब्रांड अपने प्रचार के लिए पैसे देते हैं।
हालांकि ज्यादा फॉलोअर्स होने का मतलब ये भी नहीं है कि आपको स्पॉन्सर मिलेंगे ही। कंपनियां टारगेट ऑडियंस पर ध्यान दे रही हैं। ऐसे में हमेशा ज्यादा फॉलोअर्स वाले अकाउंट के पास पहुंचने की जगह कंपनियां उन लोगों से भी संपर्क करती हैं, जो सीधे उन ऑडियंस तक पहुंच रहे हैं, जहां कंपनियों को अपना प्रोडक्ट बेचना है। टॉप क्रिएटर और इन्फ्लुएंसर को ब्रांड टिकटॉक पर चल रहे हैशटैग में भाग लेने के लिए भी पे करते हैं।

क्या कहना हैं इन टिकटॉकर्स का?
मोटिवेशनल स्पीकर अव्वल (Awal TsMadaan) टिकटॉक पर इंग्लिश बोलना सिखाते हैं। उनके 60 लाख फॉलोवर्स थे‌। ‘मनी भास्कर’ से बातचीत में उन्होंने बताया कि वे पिछले एक साल से टिकटॉक ऐप से जुड़े हुए थे। कई बड़ी कंपनियों ने स्पॉन्सर किया है और इसके लिए उन्हें लाखों रुपए तक मिले हैं। उनका कहना है कि कंपनियां फॉलोवर्स और कंटेंट देखती हैं और फिर उसके मुताबिक उससे संबंधित कंपनी, एजेंसी, एनजीओ अपना प्रमोशन करवाते थे‌। अव्वल को कई एजुकेशनल ऐप और संस्थानों से ऐड मिलता था‌।
दिल्ली की रहने वाली गुंजन के टिकटॉक पर 30 लाख फॉलोअर्स थे। वो हेल्थ से रिलेटेड वीडियो बनाती थी। गुंजन को एक वीडियो के लिए कंपनी 20 से 30 हजार रुपए पेमेंट करती थी। उन्होंने ‘मनी भास्कर’ को बताया कि उन्हें हर दिन चार से पांच कंपनियां अपने प्रोडक्ट के प्रमोशन के लिए अप्रोच करती थीं। छोटी कंपनियां एक ऐड वीडियो के पांच से 10 हजार रुपए तक देती थी। वहीं वीवो, ओप्पो और पूमा जैसे ब्रांड एक मिनट के ऐड के 80 हजार रुपए तक पे करने को तैयार थी।

फिक्स्ड इनकम
अगर आप इंस्टाग्राम या अन्य प्लेटफॉर्म पर वीडियो बना रहे हैं और आपका अकाउंट टिकटॉक से अटैच है, आपका कॉन्टेंट अच्छा है, तो टिकटॉक आपके संपर्क करेगा। आपसे कहेगा कि हमारे प्लेटफॉर्म पर हर दिन 20 वीडियो बनाइए, हम आपको हर महीने इतना पे करेंगे। इस तरह से टिकटॉक वीडियो बनाने वाले को एक निश्चित अमाउंट पे करने लगता है। टिकटॉक फॉलोअर्स बेस ऐसे लोगों को मंथली सैलरी देता है।
कुछ टिकटॉकर्स टिकटॉक पर फेमस होने के बाद अन्य प्लेटफॉर्म के जरिए पैसा कमाते हैं। ब्रांड अपने प्रमोशन के लिए उन्हें अप्रोच करते हैं। अगर आप टिकटॉक पर एक सिंगर के रूप में फेमस हो चुके हैं, तो ब्रांड आपको लाइव परफॉर्मेंस का मौका देते हैं। इसके बदले भी टिकटॉकर्स की इनकम होती हैं।
अब आगे क्या?
टिकटॉक के बंद होने से इस प्लेटफॉर्म से पैसा कमाने वालों का क्या होगा? मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, टिकटॉक स्टार्स देसी शॉट वीडियो प्लेटफॉर्म रोपोसो ROPOSO और चिंगारी जैसे ऐप की तरफ मूव कर रहे हैं। ‘मनी भास्कर’ की खबर के मुताबिक, रोपोसो के फाउंडर और InMobi Group के सीईओ नवीन तिवारी का कहना है कि हमारे प्लेटफॉर्म रोपोसो पर यूजर्स की संख्या बढ़ रही है। टिकटॉक के कई बड़े स्टार्स हमारे ऐप से जुड़े हैं। कंपनी का कहना है कि वो ऐसे टिकटॉक स्टार्स को अपने प्लेटफॉर्म पर मौका देगी, जिनके कंटेंट अच्छे हैं। वे यहां से कमाई कर सकते हैं। रोपोसो भारतीय ऐप है। इसे टिकटॉक का तगड़ा विकल्प माना जाता है।
हालांकि इन्फ्लुएंसर मार्केटिंग कंपनियों का मानना है कि टिकटॉक इतनी आसानी से इंडियन मार्केट छोड़ने वाला नहीं है। आने वाले समय में हो सकता है कि वह किसी भारतीय कंपनी से हाथ मिला ले और अपने बिजनेस को जारी रखे।

प्ले स्टोर पर मिले 17 ट्रोजन वाले ऐप्स, चुरा सकते हैं आपकी पर्सनल फोटोज


Google अपने प्ले स्टोर की सिक्योरिटी और यूजर की प्राइवेसी को लेकर बड़े दावे जरूर करता है, लेकिन समय समय पर प्ले स्टोर में ऐसे ऐप्स पाए जाते हैं जो यूजर की प्राइवेसी के लिए खतरनाक होते हैं.

साइबर सिक्टोरिटी फर्म Avast के मुताबिक गूगल प्ले स्टोर पर कम से कम 17 ऐसे ऐप्स ट्रोजन फैमिली के हिस्सा हैं. HiddenAds कैंपेन के तहत भारत और साउथ ईस्ट एशिया के यूजर्स को इससे टारगेट किया गया है.

Avast के मुताबिक ये ऐप्स गेमिंग ऐप की तरह ही दिखते हैं, लेकिन इन्हें ऐसे ऐड दिखाने लायक डिजाइन किया जाता है जो यूजर्स की पर्सनल इनफॉर्मेशन चोरी कर सकते हैं. सबसे खतरनाक ये है कि इस तरह के ट्रोजन ऐप्स आपके फोन में ऐसे विज्ञापन दिखाएंगे जिन्हें आप स्किप भी नहीं कर सकेंगे.

इस तरह के ट्रोजन ऐप के साथ मुश्किल ये भी है कि ये ऐप्स अपने आइकॉन को हाइड करने में सक्षम होते हैं ताकि यूजर्स को इस बात का पता ही न चले.

गौरतलब है कि Avast ने पहले गूगल को इस तरह के 47 ऐप्स के बारे में बताया था, जिनमें से गूगल ने 30 ऐप्स प्ले स्टोर से हटा दिए हैं.

इस साइबर सिक्योरिटी फर्म के मुताबिक कुछ ऐसे ऐप्स भी पाए गए हैं जो ऐड दिखाने के लिए यूजर के फोन का ब्राउजर तक खुद से ओपन कर देते हैं. हालांकि यूजर्स अपने स्मार्टफोन के फाइल मैनेजर में जा कर इसे मैनुअली अनइंस्टॉल कर सकते हैं.

इस तरह के 17 ऐप्स अलग अलग डेवेलपर द्वारा गूगल प्ले स्टोर पर अपलोड किए गए हैं और इन्हें 1.5 करोड़ बार डाउनलोड किया जा चुका है. इन ऐप्स की बात करें तो ये Skate Board, New, Find Hidden Differnces, Spot Hidden Differnces,Tony shoot - New Stacking guys जैसे ऐप्स शामिल हैं।