भारत में कैसे दी जाती है फांसी की सज़ा?

दुनियाभर में करीब एक-चौथाई देशों में मौत की सज़ा दी जाती है भारत उन एक-चौथाई देशों में से एक है. भारत में मौत की सज़ा देने के दो तरीके हैं-
1. आम नागरिकों को फांसी पर लटकाकर मृत्युदंड दिया जाता है|
2. सेना में फांसी के अलावा गोली मारकर मृत्युदंड दिया जाता है|
1973 के Code of Criminal Procedure में फांसी के लिए स्टैंडर्ड शब्दावली है – ‘hanged by the neck until death’ यानी मौत होने तक गर्दन से लटकाए रखना.
1983 में सुप्रीम कोर्ट ने ये निर्देश दिए कि सिर्फ ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ केस में फांसी की सज़ा दी जाएगी. मतलब केवल उन्हीं मामलों में जो बेहद घिनौने हों. जो अपराध इतने क्रूर हों जिनके लिए कोर्ट को लगे कि फांसी से नीचे की कोई भी सज़ा कम होगी. उदाहरण के लिए 2012 का निर्भया गैंगरेप और मर्डर केस.
हैदराबाद में वेटनरी डॉक्टर के रेप-मर्डर के बाद देशभर में गुस्से का माहौल था. सड़क से लेकर सोशल मीडिया तक फांसी की सज़ा की मांग हो रही थी. लेकिन भारत में फांसी की सज़ा की प्रोसेस कई लेयरों वाली और पेचीदा है.

fansi ki sjaa
बचने के रास्ते
मान लीजिए किसी अपराधी को सेशन कोर्ट यानी सत्र न्यायालय ने फांसी की सज़ा सुनाई.
सबसे पहले तो सेशन कोर्ट को अपने फैसले में ये बताना होता है कि ये केस ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ क्यों है. सेशन कोर्ट को हाई कोर्ट की मंज़ूरी चाहिए होती है. हाई कोर्ट ये चेक करता है कि क्या ये सच में ‘रेयरेस्ट ऑफ द रेयर’ केस है? जब दोनों कोर्ट राज़ी हो जाते हैं तब सेशन कोर्ट मौत की सज़ा सुनाता है. सेशन कोर्ट के फैसले के बाद दोषी के पास हाई कोर्ट में अपील करने का ऑप्शन होता है. हाई कोर्ट मे जज एक बार फिर सारे सबूतों पर नज़र मारते हैं.
अगर हाई कोर्ट मौत की सज़ा को बनाए रखता है तो उसके बाद सुप्रीम कोर्ट में जाने का ऑप्शन होता है. अगर सुप्रीम कोर्ट भी फांसी की सज़ा को बरकरार रखता है तो दोषी के पास एक आखिरी उम्मीद बचती है – मर्सी पिटीशन.
मर्सी पिटीशन मतलब दया याचिका. ये दया याचिका राष्ट्रपति या राज्यपाल के पास भेजी जा सकती है. इनके पास माफ करने का अधिकार होता है. लेकिन राष्ट्रपति अकेले निर्णय नहीं लेते हैं. वो गृह मंत्रालय की सलाह के बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचते हैं. राष्ट्रपति के ऊपर कोई टाइम लिमिट नहीं होती है. वो मनचाहा समय ले सकते हैं. और जब तक राष्ट्रपति इस अर्ज़ी पर फैसला नहीं लेते, दोषी को फांसी नहीं दी जा सकती. कई बार ऐसा होता है कि मर्सी पिटीशन कई सालों तक राष्ट्रपति के पास लटकी रह जाती है. अगर राष्ट्रपति भी मौत की सज़ा माफ करने से मना कर देते हैं, फिर फांसी होना तय है. फांसी का तख्ता
जब फांसी की सज़ा फाइनल हो जाती है तो इंतज़ार होता है डेथ वॉरंट का. दया याचिका रिजेक्ट होने के बाद ये डेथ वॉरंट कभी भी आ सकता है. एक हफ्ता, महीना, कई महीने और साल भी लग सकते हैं. उस डेथ वारंट में फांसी की तारीख और समय लिखा होता है. मृत्युदंड वाले कैदी के साथ आगे की कार्यवाही जेल मैनुअल के हिसाब से होती है. हर राज्य का अपना-अलग जेल मैनुअल होता है. इन जेल मैनुअल्स में सारी डिटेल्स लिखी होती हैं. कुछ कॉमन बातें आपको बताते हैं –
# डेथ वॉरंट जारी होने के बाद कैदी को बता दिया जाता है कि फांसी होने वाली है.
# किसी कैदी का डेथ वॉरंट जारी होने के बाद जेल सुप्रीटेंडेंट को प्रशासन को इसकी जानकारी देनी होती है. # यदि कैदी किसी ऐसी जेल में बंद है जहां फांसी की सजा का अरेंजमेंट नहीं है, तो डेथ वॉरंट जारी के बाद उसे दूसरी जेल में शिफ्ट किया जाता है.
# नए जेल में आते ही कैदी की पूरी चैकिंग की जाती है. उसे बाकी कैदियों से अलग सेल में रखा जाता है. ये सेल 24 घंटे एक गार्ड की निगरानी में होता है. दिन में दो बार इस कैदी की तलाशी ली जाती है. सुप्रीटेंडेंट, डिप्टी सुप्रीटेंडेंट या मेडिकल ऑफिसर कैदी के खान-पान की जांच करते हैं. बेहद सावधानी बरती जाती है ताकि कैदी किसी भी तरीके से आत्महत्या न कर सके.
# सामान्य परिस्थितियों में कैदी के परिवार को फांसी से 10-15 दिन पहले सूचना दे दी जाती है. ताकि आखिरी बार परिवार वाले मिल सकें.
# फांसी देने के लिए मनीला रस्सी का इस्तेमाल किया जाता है. इस रस्सी की सारी डिटेल्स जेल मैनुअल में लिखी होती हैं. फांसी से एक हफ्ते पहले सुप्रीटेंडेंट की मौजूदगी में इस रस्सी को चेक किया जाता है. चेक करने के बाद रस्सी को सुरक्षित लॉकअप में रख दिया जाता है. जिन जेलों में फांसी दी जाती है वहां कम से कम 2 रस्सियां मेन्टेन करके रखी जाती हैं. # फांसी का टाइम महीनों के हिसाब से अलग-अलग होता है. सुबह 6, 7 या 8 बजे. लेकिन ये वक्त हमेशा सुबह का ही होता है. इसके पीछे कारण ये है कि सुबह बाकी कैदी सो रहे होते हैं. और जिस कैदी को फांसी दी जानी है, उसे पूरे दिन मौत का इंतज़ार नहीं करना पड़ता.
# फांसी से कुछ मिनट पहले सुप्रीटेंडेंट जाकर कैदी को फांसी की जगह तक लेकर आता है. उनके साथ कुछ और गार्ड्स भी होते हैं. फांसी के वक्त जल्लाद के अलावा तीन अधिकारियों का होना जरूरी होता है- जेल सुप्रीटेंडेंट, मेडिकल ऑफिसर और मजिस्ट्रेट. सुप्रीटेंडेंट फांसी से पहले मजिस्ट्रेट को बताते हैं कि मैंने कैदी की पहचान कर ली है और उसे डेथ वॉरंट पढ़कर सुना दिया है. डेथ वॉरंट पर कैदी का साइन होना ज़रूरी होता है. अब आगे का काम जल्लाद का होता है.
# जल्लाद कैदी के मुंह पर कपड़ा डालकर, उसके गले में फंदा लगाता है. और इसके बाद लीवर खींच देता है. दुनियाभर में फांसी के चार तरीके होते हैं. भारत में लॉन्ग ड्रॉप तरीके से फांसी दी जाती है. लॉन्ग ड्रॉप में कैदी के वज़न के हिसाब से रस्सी की लंबाई फिक्स की जाती है. ये इसलिए किया जाता है ताकि झटके से गर्दन और रीड की हड्डी टूट जाए. ऐसा माना है कि फांसी में लॉन्ग ड्रॉप वाला तरीका सबसे कम क्रूर होता है. # लीवर खींचने के लगभग आधे घंटे बाद लाश को फंदे से उतारा जाता है. लेकिन उसे तभी उतारा जाता है जब मेडिकल ऑफिसर उसकी मौत की पुष्टि कर दे. मौत की पुष्टि के बाद मजिस्ट्रेट, मेडिकल ऑफिसर और सुप्रीटेंडेंट तीनों डेथ वॉरंट पर साइन करते हैं. इसके बाद उन्हें डेथ वॉरंट कोर्ट में वापस जमा करना होता है.
# फांसी के बाद लाश परिवार को सौंप दी जाती है. जिन कैदियों के परिवार नहीं होते उनकी मौत से पहले उनसे पूछा जाता है कि अंतिम संस्कार कैसे करना है.
वैसे आपको बता दें कि भारत में आखिरी फांसी 20 मार्च 2020 को निर्भया के चारों दोषी- अक्षय, विनय, पवन और मुकेश को दी गई. सुबह 5:30 बजे उन्हें सज़ा दी गई. इससे पहले साल 2015 में याकूब मेमन को दी गई थी. वो 1993 मुंबई बम ब्लास्ट का दोषी था. उससे पहले अफज़ल गुरु को 2013 और अजमल कसाब को 2012 में फांसी दी गई थी